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रील्स का ‘कूल स्वैग’ या बर्बादी का ट्रैक? छिंदवाड़ा के Gen Z में तेजी से बढ़ रहा गांजे का क्रेज!

रील्स और सोशल मीडिया का ‘कूल’ नशा युवाओं को गर्त में धकेल रहा है, छिंदवाड़ा के Gen Z में तेजी से बढ़ रहा गांजे का ट्रेंड, ​गलियों से लेकर सोशल मीडिया तक पैर पसार रहा हैं ‘स्मोकिंग’ कल्चर, पान ठेलों पर ‘गोगो पेपर’ की धड़ल्ले से बिक्री, पैरेंट्स रहें, सावधान…

छिंदवाड़ा: एक दौर था जब गांजा या किसी भी प्रकार के नशे को समाज में बेहद धिक्कार और हीन भावना से देखा जाता था। लेकिन आज के डिजिटल युग में तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। बॉलीवुड फिल्मों, वेब सीरीज और इंस्टाग्राम रील्स पर नशे को जिस तरह ‘कूल’ और ‘स्वैग’ के रूप में पेश किया जा रहा है, उसने छिंदवाड़ा के Gen Z (आज की युवा पीढ़ी) को बुरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया है। सोशल मीडिया के इस ट्रेंड से प्रभावित होकर हर दूसरा युवा जिंदगी में ‘एक बार चखने’ के चक्कर में इस दलदल में उतर रहा है।

गलियों में आसानी से मिल रहा ‘सामान’, गोगो पेपर की धड़ल्ले से बिक्री

चिंता की बात यह है कि युवाओं को इसके लिए भटकना नहीं पड़ रहा। छिंदवाड़ा शहर के लगभग हर छोटे-बड़े पान के ठेले और किराना दुकानों पर ‘गोगो पेपर’ (जिसमें गांजा भरकर पिया जाता है) धड़ल्ले से बिक रहा है। जब गोगो पेपर इतनी आसानी से हर जगह उपलब्ध है, तो साफ है कि गांजे की सप्लाई चेन भी शहर में बेहद मजबूत हो चुकी है। पुलिस लगातार नशा तस्करों पर नकेल कस रही है, लेकिन शातिर तस्कर पुलिस की आंखों में धूल झोंककर इस काले कारोबार को चला रहे हैं।


कोडवर्ड का खेल और गांजे का ‘रेट कार्ड’

शहर में गांजे की खरीद-फरोख्त के लिए बकायदा कोडवर्ड और खास ठिकाने तय हैं। युवाओं को जुगाड़ से इन जगहों पर आसानी से माल मिल जाता है:

फेमस ठिकाने और कोडवर्ड: ‘पातालेश्वर मालधक्का वाली चच्ची’, ‘हिसार भाई’, ‘शुक्लुढाना – धोती’ और ‘धर्मटेकड़ी वाले चच्चा’।

युवाओं की जेब के हिसाब से नशे का पूरा बजट सेट कर रखा है
  • छोटी पुड़िया: ₹50
  • बड़ी पुड़िया: ₹100
  • 25 ग्राम की पुड़िया: ₹1500
  • एक नंबर चोखा (प्रीमियम) माल: ₹2000 से ₹2500 तक (जानकारी सूत्रों के अनुसार)
    ​चाय-पान की दुकानों पर बने ‘स्पेशल जोन‘, डर हुआ खत्म

    ​पहले युवाओं में बड़ों का खौफ होता था। अगर कोई सार्वजनिक जगह पर स्मोकिंग करता था, तो कोई भी टोक देता था या घर पर शिकायत होने का डर रहता था। लेकिन अब शहर के कुछ बड़े पान ठेलों और चाय की दुकानों पर युवाओं के लिए स्मोकिंग की अलग से ‘गुप्त व्यवस्था’ (प्राइवेट केबिन या स्पेस) की जा रही है। ऐसी जगहों पर दिन-रात युवाओं को कश लगाते देखा जा सकता है। प्रबुद्ध नागरिकों की मांग है कि युवाओं को बर्बाद करने वाले ऐसे ठिकानों को तत्काल बंद किया जाना चाहिए।

    कानूनी प्रावधान: जेब में गांजा मिला तो होगी जेल

    भारतीय कानून के तहत गांजा रखना, बेचना या उसका सेवन करना NDPS एक्ट (नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985) के तहत गंभीर अपराध है।
    पकड़े जाने पर सजा: यदि किसी के पास कम मात्रा (स्मॉल क्वांटिटी) में भी गांजा मिलता है, तो उसे 1 साल तक की कठोर कैद और ₹10,000 तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
    ​सेवन करने पर: गांजे का सेवन करते हुए पकड़े जाने पर भी कड़ी सजा और जुर्माने का प्रावधान है। बार-बार पकड़े जाने पर यह सजा और सख्त हो जाती है। जमानत मिलना भी बेहद मुश्किल होता है। (जानकारी गूगल-सर्च के अनुसार)

    माता-पिता की जिम्मेदारी: ‘रील्स’ की दुनिया से बच्चों को बाहर निकालें

    बढ़ती उम्र में बच्चों के व्यवहार में बदलाव आना स्वाभाविक है, लेकिन अभिभावकों को बेहद सतर्क रहने की जरूरत है। अगर आपका बच्चा अचानक ज्यादा पैसे मांगने लगा है, गुमसुम रहता है, उसकी आंखें लाल रहती हैं या उसकी संगति बदल गई है, तो तुरंत ध्यान दें। सोशल मीडिया की आभासी दुनिया के फेर में कहीं आपका बच्चा नशे के अंधेरे में न खो जाए।

    ​विशेषज्ञ की राय: मानसिक संतुलन खो रहे हैं युवा

    ​”गांजा केवल एक नशा नहीं है, बल्कि यह धीरे-धीरे युवाओं के मस्तिष्क को सुन्न कर देता है। इसके सेवन से सोचने-समझने की क्षमता खत्म होने लगती है, एकाग्रता भंग होती है, भ्रम (Hallucinations) की स्थिति बनती है और युवा डिप्रेशन व एंग्जायटी का शिकार हो जाते हैं। फेफड़ों और दिल की बीमारियां मुफ्त में मिलती हैं। बढ़ती उम्र में बच्चों में व्यवहारिक बदलाव आना सामान्य है, लेकिन अगर बच्चा अचानक चिड़चिड़ा हो रहा है, आंखें लाल रह रही हैं, या उसकी सेहत बदली है, तो माता-पिता की बड़ी जिम्मेदारी है कि वे तुरंत ध्यान दें। बच्चों को इस अंधकार से बचाना सिर्फ पुलिस का नहीं, हम सबका कर्तव्य है।”

    — राकेश शर्मा, मातृ सेवा संघ जिला नशा मुक्ति सहपुनर्वास केंद्र, छिंदवाड़ा

    खबर : करण विश्वकर्मा – 9755432229